सर सैय्यद अहमद खान मुसलमानों के बीच मॉडर्न एजुकेशन के हिमायती थे- जेनुल अंसारी

जामताड़ा :- झारखंड प्रदेश मोमीन कॉन्फ्रेंस के प्रदेश महा सचिव जेनुल अंसारी ने कहा कि सर सैय्यद अहमद खान मुसलमानों के बीच मॉडर्न एजुकेशन के हिमायती थे, जिन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (पहले मोहम्मडन ऐंग्लो इंडियन कॉलेज) को क़ायम कर तालीम की ऐसी शम्मा भड़काई जो आज भी अपने आबो-ताब से आफ़ताब की तरह रौशन है। उनकी कोशिशों से अलीगढ़ इंकिलाब की शुरूआत हुई, जिसमें शामिल दानिशवर व रहनुमाओं ने हिंदुस्तानियों खासकर मुसलमानों को इल्म देने का काम किया। सर सैय्यद ने 1857 के पहली जंगे आज़ादी की लड़ाई पर “असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द” किताब लिखकर उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना की लेकिन अंग्रेजी तालीम पर जोर दिया। ये अपने वक़्त के असरदार मुस्लिम क़ायद थें, जिन्होंने उर्दू को हिन्दुस्तानी मुसलमानों की इज़तमायी ज़ुबान बनाने पर जोर दिया। उस वक़्त के मुसलमान उन्हें कुफ़्र का फतवा देते रहें बावजूद इसके क़ौम का दुश्मन बनकर या बिगड़कर न मिले बल्कि नरमी व सफ़क़त से उन्हें तालीम हासिल करने के लिए समझाते रहें। वे अच्छी तरह से जानते थे, इसलिए उनकी बातों की परवाह किये बिना वे अपनी मंज़िल पर पहुँचने के लिए कोशां रहे।

आज पूरी दुनिया सर सैय्यद की इस मेहनत का लोहा मानती है जो आज AMU की शक़्ल में हमारे सामने मौजूद है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सैयद अहमद खान उस दौर के सबसे ज़हीन इंसानों में से एक थे। गणित, चिकित्सा और साहित्य कई विषयों में वे पारंगत थे। इस बात की गवाही मौलाना अबुल कलाम का वह भाषण है जो उन्होंने 20 फ़रवरी,1949 को एएमयू में दिया था। उन्होंने कहा था, ‘मैं मानता था, मानता हूं कि वे (सैयद अहमद) 19वीं शताब्दी के सबसे महान इंसानों में एक थे।’ उनका यह भी मानना था कि जो हैसियत बंगाल और हिंदुओं के बीच राजा राम मोहन रॉय की थी, वही कद सैयद अहमद खान का उत्तर भारत में और ख़ासकर मुसलमानों के बीच था। आज़ाद यहीं नहीं रुके, उन्होंने सैयद खान को भारतीय मुसलामानों के सामाजिक संघर्ष का झंडाबरदार भी बताया। आयें हम सब मिलकर उनके मिशन व ख़्वाब को एक ताबीर दें ताकि आने वाली नसलें इल्म की रौशनी से सरफराज़ हो सके।

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